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प्रश्न: शून्यता क्या है? क्या शून्य होना डरावना नहीं है?
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जब साधक गहरे जप और ध्यान में उतरता है, तो एक समय ऐसा आता है जब नाम भी छूट जाता है और केवल एक गहरा सन्नाटा बचता है। इसी को 'शून्यता' कहते हैं।
लेकिन शून्यता का अर्थ 'खालीपन' या 'अभाव' नहीं है। यह तो पूर्णता है—वह रिक्तता जो ब्रह्मांड की ऊर्जा से भरने के लिए खाली हुई है।
- शून्यता का अर्थ 'कुछ नहीं' नहीं है
- यह वह स्थान है जहाँ 'सब कुछ' समाया है
- यह अहंकार की मृत्यु है, आत्मा का जन्म है
- यह डरावना नहीं, बल्कि परम शांति का द्वार है
शून्य होने के बाद क्या होता है?
जब आप पूरी तरह शून्य हो जाते हैं तो आपके भीतर एक नई चेतना का उदय होता है। आप शरीर नहीं रहते, आप वह चेतना बन जाते हैं जो हर साँस में गूँजती है, जो हर कण में व्याप्त है।
- शून्य होने के बाद 'मैं' मिट जाता है
- 'तू' और 'मैं' का भेद समाप्त हो जाता है
- केवल 'वही' बचता है—अनंत, अविनाशी, सच्चिदानंद
- यही 'भगवत् सानिध्य' है, यही 'पूर्ण बोध' है
शून्यता कोई उपलब्धि नहीं
शून्यता कोई उपलब्धि नहीं है जिसे पाया जाए। यह तो तब प्रकट होती है जब सब कुछ छूट जाता है। इसे पाने की चाहत भी एक बाधा है। बस जप करते रहें, शून्यता स्वयं आएगी।
जब यह शून्यता गहरी होती है तो साधक को लगता है कि वह ब्रह्मांड में विलीन हो रहा है। वह नमक की पुतली की तरह सागर में घुल जाता है और अंत में पाता है कि वह ही सागर है।
- शून्यता में डरें नहीं
- यह पुराने 'मैं' की मृत्यु है
- इसी शून्य में सत्य प्रकट होता है
- जो मिटने को तैयार है, वही अमर होने का अधिकारी है
📖 शब्द से शून्य तक
इस विषय को और गहराई से समझने के लिए आप हमारी पुस्तक शब्द से शून्य तक पढ़ सकते हैं। इसमें शून्यता, अनहद नाद, आजपा और आत्म-साक्षात्कार तक की पूरी यात्रा है।
पुस्तक में क्या है:
- नाम जप के तीन स्तर—वैखरी, मध्यमा और पश्यंती
- आजपा जप क्या है और कैसे प्राप्त करें
- अनहद नाद और शून्यता का अनुभव
- 21 पड़ाव और साधकों के वास्तविक अनुभव
- 40 दिन का साधना कार्यक्रम
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