टेलीपैथी ज्ञान-संग्रह
स्वधा देवी और स्वधास्तोत्र: पाठ विधि, संपूर्ण श्लोक, सरल अर्थ और पितृ तर्पण का महत्व
योग, ध्यान और आध्यात्मिक जीवन के लिए सरल व विश्वसनीय मार्गदर्शन
लेख साझा करें
☰ इस लेख की विषय-सूची खोलें बंद करें
क्या आप जानते हैं—धार्मिक ग्रंथों में केवल ‘स्वधा’ शब्द के श्रद्धापूर्वक उच्चारण को भी अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है?
यह वही ‘स्वधा’ है जो पितरों को तृप्त करने वाली मानी जाती है। यह श्राद्ध और तर्पण का आधार है तथा ब्रह्मा जी द्वारा कही गई स्तुति से जुड़ी है। हम पितरों को याद करते हैं, श्राद्ध करते हैं और तर्पण अर्पित करते हैं, परंतु मन में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या हमारी श्रद्धा सही रूप में उन तक पहुँचती है? स्वधास्तोत्र इसी भाव को गहराई देता है।
इस स्तोत्र में ‘स्वधा’ शब्द के तीन बार स्मरण से श्राद्ध और तर्पण का फल मिलने तथा एकाग्रचित्त होकर पाठ या श्रवण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होने का वर्णन है। आगे इसकी सामान्य पाठ विधि, संपूर्ण श्लोक और सरल हिंदी अर्थ दिए गए हैं।
स्वधास्तोत्र की पाठ विधि
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पितरों की तस्वीर के सामने या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- कुश अथवा स्वच्छ आसन का प्रयोग करें।
- मन को शांत करके श्रद्धा और एकाग्रता से पाठ करें।
- श्राद्ध के दिन तथा पितृ पक्ष में इसका पाठ विशेष रूप से किया जा सकता है।
- उच्चारण यथासंभव स्पष्ट और भावपूर्ण रखें।
अथ स्वधास्तोत्रम्
ब्रह्मोवाच
श्लोक १
स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नर।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत् ॥
सरल अर्थ— ‘स्वधा’ शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य को तीर्थस्नान के समान पुण्य और वाजपेय यज्ञ के तुल्य फल मिलने का वर्णन है।
श्लोक २
स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।
श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च ॥
सरल अर्थ— जो व्यक्ति ‘स्वधा, स्वधा, स्वधा’ इस प्रकार तीन बार स्मरण करता है, उसे श्राद्ध और समयानुसार किए गए तर्पण का फल प्राप्त होता है।
श्लोक ३
श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः।
लभेच्छ्राद्धशतानां च पुण्यमेव न संशयः ॥
सरल अर्थ— जो श्राद्ध के समय एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्र को सुनता है, उसे सौ श्राद्धों के समान पुण्य मिलने का वर्णन है।
श्लोक ४
स्वधास्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम् ॥
सरल अर्थ— जो मनुष्य तीनों संध्याओं में ‘स्वधा’ का पाठ करता है, उसके लिए विनीत एवं साध्वी पत्नी तथा गुणवान पुत्र की प्राप्ति का फल बताया गया है।
श्लोक ५
पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी।
श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा ॥
सरल अर्थ— हे स्वधा देवी, आप पितरों के प्राणों के समान, द्विजों के जीवनस्वरूप, श्राद्ध की अधिष्ठात्री और श्राद्ध कर्म का फल प्रदान करने वाली हैं।
श्लोक ६
बहिर्गच्छ मन्मनसः पितॄणां तुष्टिहेतवे।
सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे ॥
सरल अर्थ— हे स्वधा, पितरों की तुष्टि, द्विजों की प्रसन्नता और गृहस्थों की वृद्धि के लिए मेरे मन से प्रकट हों।
श्लोक ७
नित्या त्वं नित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते।
आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव ॥
सरल अर्थ— हे सुव्रते, आप नित्य और गुणस्वरूपा हैं। सृष्टि में आपका आविर्भाव और प्रलय में तिरोभाव माना गया है।
श्लोक ८
ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा।
निरूपिताश्चतुर्वेदे षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम् ॥
सरल अर्थ— ॐ, स्वस्ति, नमः, स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा—ये छह शब्द वेदों में कर्म करने वालों के लिए प्रशस्त बताए गए हैं।
श्लोक ९
पुरासीस्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी।
धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता ॥
सरल अर्थ— पूर्वकाल में आप गोलोक में राधिका की सखी स्वधागोपी थीं। स्वधा स्वरूप को हृदय में धारण करने के कारण आप ‘स्वधा’ नाम से स्मरण की गईं।
श्लोक १०
इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।
तस्थौ च सहसा सद्यः स्वधा साविर्बभूव ह ॥
सरल अर्थ— ऐसा कहकर ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक की सभा में स्थित हुए और उसी समय स्वधा देवी प्रकट हुईं।
श्लोक ११
तदा पितृभ्यः प्रददौ तामेव कमलाननाम्।
तां सम्प्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिताः ॥
सरल अर्थ— ब्रह्मा जी ने कमलमुखी स्वधा देवी को पितरों को प्रदान किया। उन्हें प्राप्त करके पितर अत्यंत प्रसन्न हुए।
श्लोक १२
स्वधास्तोत्रमिदं पुण्यं यः शृणोति समाहितः।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत् ॥
सरल अर्थ— जो एकाग्रचित्त होकर इस पुण्यमय स्वधास्तोत्र को सुनता है, उसके लिए सभी तीर्थों में स्नान और वेदपाठ के समान फल बताया गया है।
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे ब्रह्माकृतं स्वधास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
स्वधा, पितृलोक और मृत्यु के बाद चेतना की यात्रा
श्राद्ध, तर्पण और पितरों की तृप्ति का विचार केवल एक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मृत्यु के बाद चेतना की यात्रा, पितृलोक, कर्म और विभिन्न लोकों का भी विस्तृत वर्णन मिलता है।
इन विषयों को क्रमबद्ध और सरल रूप में समझने के लिए हमारी ई-बुक “14 लोक (चौदह लोक) – मृत्यु के पार चेतना का मानचित्र” पढ़ें। इसमें मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा, सूक्ष्म अवस्थाओं और चौदह लोकों की अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है।
यहाँ क्लिक करके 14 लोक ई-बुक देखें
स्वधास्तोत्र का सार
स्वधास्तोत्र में ब्रह्मा जी द्वारा स्वधा देवी की महिमा कही गई है। इसमें श्रद्धापूर्वक ‘स्वधा’ का तीन बार स्मरण करने से श्राद्ध और तर्पण का फल तथा एकाग्रचित्त होकर स्तोत्र सुनने से तीर्थस्नान और वेदपाठ के समान पुण्य मिलने का वर्णन है। पाठ का मूल आधार केवल शब्द नहीं, बल्कि श्रद्धा, स्मरण और पितरों के प्रति कृतज्ञता है।
नोट: ऊपर बताए गए फल धार्मिक ग्रंथ और आस्था-परंपरा पर आधारित हैं। पाठ श्रद्धा तथा अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें।
आपके लिए चुने हुए लेख
आगे क्या पढ़ें?
-
क्या आपने कभी अपने भीतर की उस आदिम ऊर्जा को महसूस किया है जो सृजन और विनाश दोनों कर सकती है? जानिए महातल लोक का रहस्य
लेख पढ़ें → -
क्या मृत्यु के बाद चेतना खत्म हो जाती है या 14 लोकों में कहीं और चली जाती है?
लेख पढ़ें → -
पीपल के पेड़ में पितरों का वास क्यों माना जाता है? शनिवार को दीपक जलाने का महत्व
लेख पढ़ें → -
क्या सपनों का 14 लोकों से कोई संबंध है? स्वप्न, चेतना और आध्यात्मिक रहस्य
लेख पढ़ें →